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बिहार विधानसभा चुनाव 2020: क्या नीतीश चुनाव लड़ने से डरते है – आखिरी बार कब जीता था चुनाव

क्या नीतीश चुनाव लड़ने से डरते है – आखिरी बार कब जीता था चुनाव

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार फिर चुनाव नहीं लड़ेंगे। इसके पर्याप्त संकेत तब मिले जब पत्रकारों ने उनसे इस बाबत पूछा तो उनका कहना था – हम अलायंस के लिए लड़ते हैं। यानी नीतीश विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान अपना फोकस मैक्रो मैनेजमेंट पर रखेंगे।

नीतीश कुमार ने आखिरी बार 2004 का लोकसभा चुनाव लड़ा था। तब वो नालंदा से जीते थे। इससे पहले वो पांच बार बाढ लोकसभा क्षेत्र से सांसद रहे। बिहार विधानसभा के सदस्य के नाते वो पहली और आखिरी बार 1985 में सदन में आए। 1989 तक सदस्य रहे और उसी साल संसद के लिए चुने गए। नीतीश कुमार पहला विधानसभा चुनाव 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर हरनौत से लड़े और हार गए थे।

वही राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) आरोप लगाती रही है कि नीतीश कुमार ( Nitish Kumar ) हारने के डर से चुनाव नहीं लड़ते हैं। हालांकि इन हमलों का नीतीश कुमार पर कोई फर्क नहीं पड़ता। वो अपना ध्यान पूरी चुनावी प्रक्रिया के सफल प्रबंधन पर टिकाना चाहते हैं। उनकी दलील है कि एक क्षेत्र पर फोकस करने से अच्छा अलायंस की जीत के लिए व्यापक रणनीति बनाना है। इस अलायंस में नीतीश की पार्टी जनता दल यूनाईटेड, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) शामिल है।

इसलिए नीतीश कुमार अगर एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचते हैं तो वो सदन में पिछले दरवाजे से ही कदम रखेंगे। मतलब विधान परिषद के सदस्य के तौर पर। नीतीश कुमार 2018 में विधान परिषद के सदस्य बने। इस तरह उनका मौजूदा कार्यकाल 2024 तक का है। इस लिहाज से नीतीश कुमार के सामने फौरी तौर पर कोई संवैधानिक अड़चन है ही नहीं। अगर वो सीएम बनते हैं तो उनका कार्यकाल 2025 तक का होगा. ऐसे में 2024 में उन्हें विधानसभा या परिषद का दोबारा सदस्य बनना होगा।

नीतीश कुमार लगातार तीन बार बतौर मुख्यमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा करने जा रहे हैं। ऐसे में आरजेडी सवाल पूछ रही है कि चुनाव लड़ने से क्या डर है। पार्टी अपने सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का उदाहरण देती है। लालू प्रसाद जब तक राजनीतिक तौर पर सक्रिय रहे चुनाव लड़ते रहे। यही नहीं जब कमान राबड़ी देवी को मिली तो भी उन्होंने चुनाव लड़ने से परहेज नहीं किया। जब 2020 की लड़ाई लालू के 15 साल बनाम नीतीश के 15 साल पर है, तो ये तुलना भी लाजिमी है।

चुनावी महासमर सिर्फ सरकार बनाने का खेल नहीं बल्कि जनता की नब्ज टटोलने का भी एक मौका होता है। इसीलिए इसे लोकतंत्र का महापर्व कहा गया है। ऊपरी सदन यानी विधान परिषद की परिकल्पना नीति निर्धारक विषयों पर बेहतर बहस के लिए हुई थी। ये जनता के सीधे प्रतिनिधि नहीं होते। इस सवाल पर राजनैतिक विश्लेषक सुरेंद्र किशोर कहते हैं, दरअसल बिहार में सीएम की कुर्सी पैरवी की जगह बन गई थी। लालू यादव और जगन्नाथ मिश्र जैसे सीएम इसके लिए जिम्मेदार हैं। जिस क्षेत्र का विधायक सीएम होगा , वहां के लोग लगातार सीएम हाउस का चक्कर लगाएंगे और सीएम का सारा टाइम निजी शिकायतों में ही बर्बाद हो जाएगा। दूसरी ओर सीएम का क्षेत्र होने के कारण उस इलाके के लोगों की उम्मीदें भी बहुत बढ़ जाती है। ऐसे में पूरे सूबे के लिए सोंचने का टाइम नहीं मिलता।

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